संकष्टी चतुर्थी क्या है? संक्षिप्त उत्तर
संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश का मासिक व्रत है, जो हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। संकष्टी का अर्थ है "संकटों से मुक्ति"। भक्त सूर्योदय से व्रत रखते हैं और चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलते हैं — इसलिए इसकी तारीख उस दिन से तय होती है, जिस दिन चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो। जब यह मंगलवार को पड़ती है, तो इसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं, जिसे विशेष फलदायी माना जाता है — 2027 में यह 22 जून को है। माघ मास की संकष्टी को सकट चौथ (25 जनवरी 2027) कहते हैं, और कार्तिक की संकष्टी करवा चौथ (18 अक्टूबर 2027) के साथ आती है।
संकष्टी चतुर्थी 2027 की सूची (नई दिल्ली)
| तारीख | वार | नाम | चंद्रोदय |
|---|---|---|---|
| 25 जनवरी | सोमवार | सकट चौथ (लंबोदर संकष्टी) | रात 9:16 |
| 24 फरवरी | बुधवार | द्विजप्रिय संकष्टी | रात 10:03 |
| 25 मार्च | गुरुवार | भालचंद्र संकष्टी | रात 9:49 |
| 24 अप्रैल | शनिवार | विकट संकष्टी | रात 10:32 |
| 23 मई | रविवार | एकदंत संकष्टी | रात 10:03 |
| 22 जून | मंगलवार | कृष्णपिंगल संकष्टी — अंगारकी चतुर्थी | रात 9:57 |
| 22 जुलाई | गुरुवार | गजानन संकष्टी | रात 9:27 |
| 20 अगस्त | शुक्रवार | हेरंब संकष्टी | रात 8:27 |
| 19 सितंबर | रविवार | विघ्नराज संकष्टी | रात 8:08 |
| 18 अक्टूबर | सोमवार | वक्रतुंड संकष्टी (करवा चौथ) | शाम 7:35 |
| 17 नवंबर | बुधवार | गणाधिप संकष्टी | रात 8:26 |
| 16 दिसंबर | गुरुवार | आखुरथ संकष्टी | रात 8:30 |
स्रोत: प्रमुख पंचांगों की दृक् गणना (नई दिल्ली)। चंद्रोदय शहर के अनुसार बदलता है — जयपुर में यह सामान्यतः दिल्ली से 8-12 मिनट बाद होता है। अपने शहर का समय [पंचांग](/panchang) में देखें।
संकष्टी चतुर्थी का पौराणिक महत्व
गणेश पुराण और भविष्य पुराण में संकष्टी चतुर्थी व्रत की महिमा बताई गई है। एक कथा के अनुसार एक बार देवताओं पर भारी संकट आया, तो वे भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने कार्तिकेय और गणेश में से किसी एक को संकट दूर करने भेजने का विचार किया और दोनों से पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा। गणेश जी ने माता-पिता की परिक्रमा करके कहा कि माता-पिता ही संपूर्ण संसार हैं। प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें संकट हरने का दायित्व दिया और वरदान दिया कि जो चतुर्थी के दिन उनकी पूजा करके चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके सभी संकट दूर होंगे।
हर महीने की संकष्टी गणेश जी के अलग स्वरूप को समर्पित है और उसकी अलग कथा होती है।
संकष्टी और विनायक चतुर्थी में अंतर
| बिंदु | संकष्टी चतुर्थी | विनायक (विनायकी) चतुर्थी |
|---|---|---|
| पक्ष | कृष्ण पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| व्रत खोलना | चंद्रोदय और अर्घ्य के बाद | दिन में; इस दिन चंद्र दर्शन से बचा जाता है |
| प्रमुख | सकट चौथ, अंगारकी चतुर्थी | गणेश चतुर्थी (भाद्रपद) |
गणेश चतुर्थी के बारे में पढ़ें — गणेश चतुर्थी 2027 कब है?
संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि
- 1सुबह: स्नान करके गणेश जी के सामने व्रत का संकल्प लें। फलाहारी या निर्जला व्रत रखें — अनाज न खाएं।
- 2शाम की पूजा: चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा रखें। उन्हें सिंदूर, लाल फूल, 21 दूर्वा, मोदक या लड्डू, और तिल-गुड़ (विशेषकर सकट चौथ पर) अर्पित करें।
- 3मंत्र: 'ॐ गं गणपतये नमः' का 108 बार जाप करें, या गणेश अथर्वशीर्ष और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें।
- 4कथा: उस महीने की संकष्टी व्रत कथा सुनें।
- 5चंद्र अर्घ्य: चंद्रोदय के बाद दूध, चंदन और अक्षत मिले जल से चंद्रमा को अर्घ्य दें:
- 6पारण: अर्घ्य के बाद गणेश जी का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें।
व्रत कब खोलें?
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रोदय के बाद, चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही खोला जाता है। इसलिए:
- •अपने शहर का चंद्रोदय समय पहले से देख लें।
- •शहरों में इमारतों के कारण चांद 10 से 30 मिनट देर से दिख सकता है।
- •बादल हों, तो चंद्रोदय का समय बीतने के बाद पूर्व दिशा की ओर अर्घ्य दें।
- •चंद्रोदय से पहले व्रत कभी न खोलें।
करवा चौथ पर चंद्रोदय और अर्घ्य की विस्तृत विधि भी यही है — पढ़ें करवा चौथ पर चांद को अर्घ्य देने की सही विधि।
अंगारकी चतुर्थी (22 जून 2027)
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी कहते हैं। मंगल (अंगारक) ग्रह ने गणेश जी की तपस्या करके यह वरदान पाया था कि मंगलवार की चतुर्थी उनके नाम से प्रसिद्ध होगी और इस दिन व्रत करने वाले को वर्ष भर की संकष्टियों का फल मिलेगा। महाराष्ट्र में सिद्धिविनायक जैसे मंदिरों में अंगारकी पर विशेष भीड़ होती है। मंगल दोष से परेशान लोगों के लिए भी यह व्रत शुभ माना जाता है।
सकट चौथ (25 जनवरी 2027)
माघ कृष्ण चतुर्थी को उत्तर भारत में सकट चौथ या तिलकुटा चौथ कहते हैं। माताएं संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं, तिल-गुड़ का तिलकुट बनाकर गणेश जी और सकट माता को अर्पित करती हैं, और चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
गणेश जी के प्रथम पूज्य बनने की कथा
एक बार देवताओं में यह प्रश्न उठा कि सबसे पहले किसकी पूजा हो। भगवान शिव ने कहा — जो पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटेगा, वही प्रथम पूज्य होगा। कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर तुरंत निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने अपने माता-पिता शिव और पार्वती की सात परिक्रमा की और कहा कि माता-पिता ही संपूर्ण संसार हैं। उनकी इस बुद्धि से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। इसीलिए हर शुभ कार्य और हर संकष्टी व्रत में सबसे पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है।
संकष्टी पर चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि
- 1चंद्रोदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों।
- 2लोटे में जल, थोड़ा दूध, अक्षत, रोली और सफेद फूल डालें।
- 3"ॐ सों सोमाय नमः" या "ॐ चंद्राय नमः" बोलते हुए अर्घ्य दें।
- 4दीपक दिखाकर चंद्र देव और गणेश जी को प्रणाम करें।
- 5तिल के लड्डू या मोदक का प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
बादल होने पर पंचांग में दिए चंद्रोदय समय पर पूर्व दिशा में अर्घ्य देने की परंपरा है। अपने शहर का चंद्रोदय पंचांग में देखें।
सारांश
संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश का कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत है, जो चंद्रोदय और अर्घ्य के बाद खोला जाता है। 2027 में 12 संकष्टी हैं, जिनमें 22 जून को अंगारकी चतुर्थी है। अपने शहर का चंद्रोदय पंचांग में देखें।



