तुलसी विवाह 2026: संक्षिप्त उत्तर
तुलसी विवाह 2026 शनिवार, 21 नवंबर 2026 को कार्तिक शुक्ल द्वादशी पर है (नई दिल्ली में द्वादशी तिथि 21 नवंबर सुबह 6:31 से 22 नवंबर सुबह 4:56 बजे तक)। यह विवाह परंपरागत रूप से शाम को सूर्यास्त के आसपास (गोधूलि बेला) में किया जाता है — दिल्ली में सूर्यास्त लगभग शाम 5:25 बजे है। अनेक परिवारों में तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी (20 नवंबर) की शाम किया जाता है, और कुछ क्षेत्रों में कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) तक किसी भी दिन।
| विवरण | समय (नई दिल्ली) |
|---|---|
| तुलसी विवाह | शनिवार, 21 नवंबर 2026 |
| द्वादशी तिथि | 21 नवंबर सुबह 6:31 – 22 नवंबर सुबह 4:56 |
| श्रेष्ठ समय | शाम, सूर्यास्त (लगभग 5:25) के आसपास गोधूलि बेला |
| देवउठनी एकादशी | शुक्रवार, 20 नवंबर |
| कार्तिक पूर्णिमा | मंगलवार, 24 नवंबर |
गोधूलि बेला के बारे में पढ़ें — गोधूलि मुहूर्त क्या है?। विवाह के शुभ मुहूर्त कैसे देखें — विवाह मुहूर्त कैसे देखें?
तुलसी विवाह क्या है?
तुलसी विवाह पवित्र तुलसी के पौधे (मां लक्ष्मी / वृंदा का स्वरूप) का भगवान विष्णु के शालिग्राम (या श्रीकृष्ण) स्वरूप के साथ विधिवत विवाह है। यह चातुर्मास के बाद भगवान विष्णु के जागने और विवाह के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने, विशेषकर तुलसी का कन्यादान करने से कन्यादान के समान पुण्य मिलता है — इसलिए जिन दंपतियों की बेटी नहीं है, वे भी यह पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। यह भी माना जाता है कि तुलसी विवाह कराने से घर में सुख-समृद्धि आती है और विवाह योग्य युवक-युवतियों के विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
वृंदा की कथा
वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त और पतिव्रता स्त्री थी, जिसका विवाह असुरराज जालंधर से हुआ था। जालंधर की शक्ति का स्रोत वृंदा का सतीत्व था, इसलिए देवता उसे पराजित नहीं कर पा रहे थे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा का सतीत्व भंग किया, और युद्ध में भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।
सच्चाई जानकर वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दिया — वही शालिग्राम है। फिर वृंदा ने अपने प्राण त्याग दिए और उसकी राख से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि तुलसी सदा पूजनीय रहेगी, तुलसी के बिना उनकी कोई पूजा पूर्ण नहीं होगी, और हर वर्ष कार्तिक में वे शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह करेंगे। तभी से तुलसी विवाह की परंपरा चली आ रही है।
तुलसी विवाह की सामग्री
| श्रेणी | सामग्री |
|---|---|
| मुख्य | सजा हुआ तुलसी का गमला, शालिग्राम या विष्णु/कृष्ण की प्रतिमा |
| मंडप | चार गन्ने, आम के पत्ते, फूल |
| तुलसी का श्रृंगार | लाल चुनरी, छोटी साड़ी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, महावर |
| शालिग्राम के लिए | पीला वस्त्र, जनेऊ, चंदन |
| पूजन | हल्दी, रोली, अक्षत, कलावा, घी का दीपक, धूप, कपूर |
| मालाएं | दो फूलों की मालाएं (वरमाला के लिए) |
| भोग | आंवला, बेर, सिंघाड़ा, शकरकंद, अमरूद, मिठाई, पंचामृत, नारियल |
| अन्य | जल से भरा कलश, चौकी, लाल कपड़ा, रंगोली के रंग |
तुलसी विवाह की चरणबद्ध विधि
- 1स्थान की तैयारी: आंगन या छत साफ करें; तुलसी के गमले को चौकी पर रखें और चारों ओर रंगोली बनाएं।
- 2मंडप: तुलसी के ऊपर चार गन्नों से मंडप बनाएं और उसे आम के पत्तों व फूलों से सजाएं।
- 3श्रृंगार: तुलसी जी को लाल चुनरी ओढ़ाएं और दुल्हन की तरह श्रृंगार करें; दाहिनी ओर पीले वस्त्र पर शालिग्राम या विष्णु जी को स्थापित करें।
- 4गणेश और कलश पूजन: सबसे पहले गणेश जी और फिर कलश की पूजा करें।
- 5हल्दी की रस्म: तुलसी और शालिग्राम दोनों को हल्दी लगाएं, फिर रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें।
- 6वरमाला: दोनों को फूलों की माला पहनाएं।
- 7कन्यादान: मेज़बान परिवार (प्रायः घर के बड़े दंपती) तुलसी जी का शालिग्राम को कन्यादान करें — हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर संकल्प के साथ।
- 8फेरे: घर का कोई पुरुष सदस्य शालिग्राम को हाथ में लेकर तुलसी के चारों ओर सात फेरे लगाए, जबकि महिलाएं मंगल गीत गाएं।
- 9भोग और आरती: ऋतुफल और मिठाई का भोग लगाएं, आरती करें और प्रसाद बांटें।
मंत्र:
तुलसी स्तुति:
यह श्लोक तुलसी के आठ नामों का स्मरण है, जिसके पाठ का विशेष महत्व माना जाता है।
तुलसी विवाह के नियम
- •तुलसी विवाह के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
- •विवाह शाम को, गोधूलि बेला या प्रदोष काल में करना श्रेष्ठ है।
- •पूजा में तुलसी के पौधे को स्वस्थ और हरा-भरा रखें; सूखा पौधा हो तो नया लगाएं।
- •विवाह के बाद तुलसी की चुनरी और श्रृंगार किसी सुहागिन को दान करें।
- •तामसिक भोजन और कलह से दूर रहें।
राजस्थान और देश भर में तुलसी विवाह
राजस्थान के कई क्षेत्रों में तुलसी विवाह पूरी बारात, गीतों और भोज के साथ धूमधाम से मनाया जाता है — कुछ गांवों में शालिग्राम की बारात मंदिर से निकलती है और तुलसी का "कन्यादान" किसी परिवार द्वारा किया जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में भी तुलसी विवाह के बाद ही विवाह का मौसम आरंभ माना जाता है। अनेक मंदिरों में सामूहिक तुलसी विवाह का आयोजन होता है।
तुलसी विवाह के बाद क्या करें?
- •विवाह के बाद तुलसी की चुनरी और श्रृंगार की सामग्री किसी सुहागिन या ब्राह्मणी को दान करें।
- •गन्ने के मंडप के गन्ने प्रसाद के रूप में बांटें।
- •कार्तिक पूर्णिमा तक प्रतिदिन तुलसी के पास दीपक जलाएं।
- •तुलसी के पौधे को स्वस्थ रखें — नियमित जल, धूप और सर्दी में पाले से बचाव।
घर में तुलसी से जुड़े नियम
- •तुलसी को घर के आंगन, बालकनी या उत्तर-पूर्व दिशा में रखें।
- •रविवार, एकादशी और संध्या के बाद तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
- •पत्ते तोड़ते समय नाखून न लगाएं; उंगलियों से धीरे से तोड़ें।
- •तुलसी के सूखे पौधे को फेंकें नहीं — उसे सम्मानपूर्वक किसी पवित्र जल या मिट्टी में विसर्जित करें और नया पौधा लगाएं।
- •तुलसी के पत्ते भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अर्पित करें, पर गणेश जी को नहीं।
सामूहिक तुलसी विवाह
कई मंदिरों और सोसाइटियों में सामूहिक तुलसी विवाह का आयोजन होता है, जिसमें पूरी बारात, मंगल गीत, फेरे और भोज होते हैं। इसमें भाग लेने से परिवार के सदस्य — विशेषकर बच्चे — परंपरा से जुड़ते हैं। यदि घर में तुलसी विवाह संभव न हो, तो किसी नज़दीकी मंदिर के आयोजन में कन्यादान की सामग्री या भोज के लिए अन्न का दान करके भी पुण्य प्राप्त किया जा सकता है।
सारांश
तुलसी विवाह 2026 शनिवार, 21 नवंबर को है (अनेक परिवारों में 20 नवंबर की शाम)। शाम को तुलसी जी का दुल्हन की तरह श्रृंगार करें, गन्ने का मंडप बनाएं, शालिग्राम के साथ हल्दी, वरमाला, कन्यादान और सात फेरे की रस्में करें, और प्रसाद बांटें। देवउठनी एकादशी की जानकारी — देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
जय तुलसी माता!


