देवउठनी एकादशी 2026: संक्षिप्त उत्तर
देवउठनी (प्रबोधिनी / देवोत्थान) एकादशी 2026 स्मार्त (गृहस्थ) व्रतियों के लिए शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को है। एकादशी तिथि 20 नवंबर सुबह 7:15 बजे से 21 नवंबर सुबह 6:31 बजे तक रहेगी। पारण (व्रत खोलना) शनिवार, 21 नवंबर को नई दिल्ली में दोपहर 1:11 से 3:18 बजे तक होगा (हरि वासर दोपहर 12:07 बजे समाप्त होने के बाद)। वैष्णव/इस्कॉन भक्त और गौण व्रत रखने वाले इसे 21 नवंबर को रखेंगे, जिसका पारण 22 नवंबर को (दिल्ली में सुबह 6:49 से 8:56) होगा। तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर (द्वादशी) को है।
| विवरण | समय (नई दिल्ली) |
|---|---|
| देवउठनी एकादशी (स्मार्त) | शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 |
| एकादशी तिथि | 20 नवंबर सुबह 7:15 – 21 नवंबर सुबह 6:31 |
| पारण | 21 नवंबर, दोपहर 1:11 – 3:18 |
| हरि वासर समाप्त | 21 नवंबर, दोपहर 12:07 |
| गौण / वैष्णव एकादशी | शनिवार, 21 नवंबर |
| गौण पारण | 22 नवंबर, सुबह 6:49 – 8:56 |
| तुलसी विवाह | शनिवार, 21 नवंबर |
| कार्तिक पूर्णिमा | मंगलवार, 24 नवंबर |
दो तारीखें क्यों?
20 नवंबर को एकादशी तिथि सुबह 7:15 बजे से है और 21 नवंबर को सूर्योदय के समय भी कुछ देर (सुबह 6:31 तक) एकादशी रहती है। गृहस्थों के लिए स्मार्त परंपरा में 20 नवंबर को व्रत रखा जाएगा। वैष्णव संप्रदाय दशमी-विद्धा एकादशी को त्यागकर अगले दिन व्रत रखते हैं, इसलिए उनके लिए व्रत 21 नवंबर को है। दोनों ही परंपराएं शास्त्रसम्मत हैं — अपनी संप्रदाय परंपरा का पालन करें। एकादशी के नियम विस्तार से पढ़ें — एकादशी क्या होती है?
पारण में हरि वासर का ध्यान
द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है, जिसमें पारण नहीं किया जाता। 21 नवंबर को दिल्ली में हरि वासर दोपहर 12:07 बजे समाप्त हो रहा है, इसलिए स्मार्त व्रतियों का पारण दोपहर 1:11 से 3:18 बजे के बीच होगा। शास्त्र मध्याह्न में पारण से बचने की सलाह भी देते हैं, इसलिए यह समय निर्धारित किया गया है।
देवउठनी एकादशी क्या है?
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं — इस अवधि को चातुर्मास कहते हैं। इन चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे बड़े मांगलिक कार्य परंपरागत रूप से नहीं किए जाते। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं — इसलिए इसे देवउठनी ("देव का उठना") या प्रबोधिनी ("जागरण") एकादशी कहते हैं। भगवान के जागने के साथ ही विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों का मौसम फिर से आरंभ हो जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने शंखासुर नामक दैत्य से लंबे युद्ध के बाद आषाढ़ एकादशी को विश्राम आरंभ किया और कार्तिक एकादशी को जागे। एक अन्य कथा राजा बलि से जुड़ी है — वामन अवतार में बलि को पाताल का राजा बनाने के बाद भगवान ने वरदान दिया कि वे चार महीने पाताल में बलि के यहां निवास करेंगे।
देवउठनी एकादशी की पूजा विधि
- 1व्रत: एकादशी के दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्जला, फलाहारी या एक समय भोजन वाला व्रत रखें।
- 2चौक और चरण: शाम को आंगन या पूजा स्थान पर गेरू या चावल के घोल से भगवान के चरणों के चिह्न और चौक बनाएं।
- 3गन्ने का मंडप: गन्नों से छोटा मंडप बनाएं और उसके नीचे भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम स्थापित करें।
- 4ऋतुफल का भोग: मौसमी उपज — गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, अमरूद, मूली, आंवला — तुलसी दल, फूल और दीपक के साथ अर्पित करें।
- 5भगवान को जगाना: घंटी और शंख बजाते हुए यह मंत्र बोलें:
अर्थ: हे गोविंद, उठिए, हे जगत्पति, निद्रा त्यागिए। हे जगन्नाथ, आपके सोने से यह संसार सोया रहता है, और आपके जागने से ही सब कार्य होते हैं — उठिए, हे माधव।
- 6लोकगीत: कई परिवार थाली या सूप बजाते हुए पारंपरिक "देव उठाने" के लोकगीत गाते हैं, जिनमें भगवान से जागकर संसार का कार्यभार संभालने की प्रार्थना की जाती है।
- 7दीपदान: पूरे घर में दीपक जलाएं; संभव हो तो रात्रि जागरण और भजन करें।
- 8पारण: 21 नवंबर को पारण के समय तुलसी दल ग्रहण करके व्रत खोलें।
देवउठनी एकादशी के नियम
- •एकादशी के दिन चावल न खाएं।
- •तुलसी दल एक दिन पहले तोड़कर रखें — एकादशी को तुलसी न तोड़ें।
- •प्याज, लहसुन, मदिरा और क्रोध से बचें।
- •दिन में सोने से बचें; भगवान के जागरण के दिन स्वयं जागृत रहना श्रेष्ठ है।
- •ज़रूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दीपक का दान करें।
शुभ कार्यों की सूची पढ़ें — देवउठनी एकादशी पर कौन से काम शुभ माने जाते हैं?
तुलसी विवाह
द्वादशी (21 नवंबर) को अनेक परिवार तुलसी जी का भगवान शालिग्राम या विष्णु के साथ विवाह कराते हैं। कई क्षेत्रों में तुलसी विवाह एकादशी की शाम ही किया जाता है, और कुछ स्थानों पर कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) तक किसी भी दिन। पूरी विधि पढ़ें — तुलसी विवाह 2026 कब है?
भीष्म पंचक
देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक के पांच दिनों को भीष्म पंचक या विष्णु पंचक कहते हैं — 2026 में 20 से 24 नवंबर तक। मान्यता है कि भीष्म पितामह ने शरशय्या पर इन्हीं दिनों भगवान श्रीकृष्ण से धर्म का उपदेश प्राप्त किया था। इन पांच दिनों में व्रत, स्नान और दान का विशेष महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा के बारे में पढ़ें — कार्तिक पूर्णिमा 2026 कब है?
राजस्थान में देवउठनी एकादशी
राजस्थान में इसे "देव उठनी ग्यारस" या "बड़ी ग्यारस" कहते हैं। इस दिन से राज्य में विवाहों का मौसम शुरू होता है, और कई जगह यह दिन अबूझ सावा (बिना मुहूर्त देखे विवाह का दिन) माना जाता है। गांवों में घरों के आंगन में मांडणे बनाए जाते हैं और गन्ने व मौसमी फलों से भगवान को जगाया जाता है।
चातुर्मास 2026 का समापन
देवउठनी एकादशी के साथ 2026 का चातुर्मास समाप्त होता है। इन चार महीनों में संतों ने एक स्थान पर रहकर साधना की और गृहस्थों ने कई प्रकार के संयम रखे — जैसे किसी विशेष भोजन का त्याग, एक समय भोजन, या भूमि पर शयन। देवउठनी एकादशी पर इन व्रतों का उद्यापन किया जाता है — भगवान को अर्पित करके त्यागी हुई वस्तु फिर से ग्रहण करना शुरू किया जाता है, और ब्राह्मणों व ज़रूरतमंदों को दान दिया जाता है।
देवउठनी एकादशी पर विशेष भोग
| भोग | महत्व |
|---|---|
| गन्ना | नई फसल, मिठास |
| सिंघाड़ा | कार्तिक का प्रमुख ऋतुफल |
| शकरकंद | भूमि से उपजा अन्न |
| बेर, अमरूद, आंवला | मौसमी फल, आरोग्य |
| मूली | लोक परंपरा में नई सब्जी का आरंभ |
| पंचामृत | भगवान का अभिषेक और प्रसाद |
देवउठनी एकादशी पर व्रत कथा (संक्षेप में)
एक प्रचलित कथा के अनुसार एक राजा के राज्य में एकादशी पर सभी लोग व्रत रखते थे। एक दिन एक व्यक्ति नौकरी मांगने आया, और राजा ने शर्त रखी कि एकादशी पर अन्न नहीं मिलेगा। उस व्यक्ति ने पहले तो भूख से व्याकुल होकर अन्न मांगा, पर बाद में श्रद्धा से एकादशी का पालन करने लगा। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु उसके साथ भोजन करने आने लगे। यह कथा बताती है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया व्रत भगवान को अत्यंत प्रिय है। विभिन्न क्षेत्रों में इस एकादशी की कथा अलग रूपों में सुनाई जाती है।
सारांश
देवउठनी एकादशी 2026 शुक्रवार, 20 नवंबर को है (वैष्णव: 21 नवंबर)। शाम को गन्ने, ऋतुफल और 'उत्तिष्ठ गोविन्द' मंत्र से भगवान विष्णु को जगाएं, 21 नवंबर को दोपहर 1:11 से 3:18 (दिल्ली) के बीच पारण करें और 21 नवंबर को तुलसी विवाह मनाएं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!



