करवा चौथ की कथा: संक्षिप्त उत्तर
करवा चौथ की मुख्य व्रत कथा रानी वीरावती की है, जो सात भाइयों की इकलौती बहन थी। अपनी पहली करवा चौथ पर वह भूख-प्यास से बेहोश हो गई, तो भाइयों ने पेड़ पर छलनी के पीछे दीपक रखकर उसे नकली चांद दिखा दिया। उसने व्रत तोड़ दिया और उसके पति की मृत्यु हो गई। मां पार्वती (कुछ कथाओं में इंद्राणी) के मार्गदर्शन में उसने पूरे वर्ष श्रद्धा से व्रत किया और उसके पति को पुनर्जीवन मिला। यह कथा 29 अक्टूबर 2026 की शाम पूजा के समय (दिल्ली में 5:38–6:56, जयपुर में 5:46–7:03) हाथ में गेहूं के दाने या अक्षत लेकर सुनी जाती है।
वीरावती की पूरी कहानी
सात भाइयों की लाडली बहन
प्राचीन समय में इंद्रप्रस्थपुर (कुछ कथाओं में शाकप्रस्थपुर) नामक नगर में वेदशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। सात भाइयों की इकलौती बहन होने के कारण वीरावती सबकी लाडली थी। भाई उसे इतना प्रेम करते थे कि पहले उसे भोजन कराते, फिर स्वयं खाते। समय आने पर वीरावती का विवाह एक योग्य राजकुमार से हुआ।
पहली करवा चौथ
विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वीरावती अपने मायके आई हुई थी। उसने अपनी भाभियों के साथ सुबह से निर्जला व्रत रखा। दिन ढलते-ढलते वह भूख और प्यास से व्याकुल हो गई, क्योंकि यह उसका पहला व्रत था और वह इतने कठोर उपवास की अभ्यस्त नहीं थी। शाम होते-होते वह बेहोश होकर गिर पड़ी।
भाइयों का छल
भाइयों से अपनी लाडली बहन की यह दशा देखी नहीं गई। वे जानते थे कि वीरावती चांद देखे बिना और अर्घ्य दिए बिना भोजन नहीं करेगी। तब उन्होंने एक उपाय सोचा। सबसे छोटा भाई एक दीपक और छलनी लेकर दूर एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गया और छलनी के पीछे दीपक जला दिया। दूर से छलनी में से छनकर आती रोशनी ऐसी लगती थी, जैसे चांद उग आया हो।
भाइयों ने वीरावती को होश में लाकर कहा — "देखो बहन, चांद निकल आया है। अर्घ्य देकर भोजन कर लो।" वीरावती ने भाभियों से भी चलने को कहा, पर भाभियां सच जानती थीं; उन्होंने कहा कि अभी असली चांद नहीं निकला है। लेकिन भूख से व्याकुल वीरावती ने भाइयों की बात पर भरोसा करके उस "चांद" को अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई।
अपशकुन और दुखद समाचार
जैसे ही उसने पहला कौर मुंह में डाला, उसमें बाल निकल आया। दूसरा कौर लिया तो उसे छींक आ गई। तीसरा कौर उठाया ही था कि ससुराल से समाचार आया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। वीरावती पर जैसे वज्रपात हो गया। तब भाभियों ने उसे सच बताया कि भाइयों ने छल से नकली चांद दिखाया था और असली चंद्रोदय से पहले व्रत टूट जाने से यह अनर्थ हुआ है।
वीरावती का संकल्प
वीरावती ने निश्चय किया कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व व भक्ति के बल पर उन्हें फिर से जीवित करेगी। वह पति के शरीर के पास बैठकर दिन-रात प्रार्थना करती रही। उसकी अटूट श्रद्धा देखकर मां पार्वती (कुछ कथाओं में देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी) प्रकट हुईं।
मां ने उससे कहा — "पुत्री, तुम्हारा व्रत छल से टूट गया था, इसीलिए यह अनर्थ हुआ। यदि तुम पूरे वर्ष हर महीने की चतुर्थी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियम से करोगी, और अगली करवा चौथ का व्रत विधिपूर्वक पूरा करोगी, तो तुम्हारे पति को फिर से जीवन मिलेगा।"
पति को पुनर्जीवन
वीरावती ने पूरे एक वर्ष तक हर चतुर्थी का व्रत किया। इस दौरान वह पति के शरीर की सेवा करती रही। अगले वर्ष करवा चौथ आने पर उसने पूरी निष्ठा से निर्जला व्रत रखा, शाम को मां गौरी की पूजा की, कथा सुनी और असली चंद्रोदय होने पर ही अर्घ्य दिया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां पार्वती ने उसके पति को पुनर्जीवन का वरदान दिया। वीरावती का पति जीवित हो उठा और दोनों सुखपूर्वक रहने लगे।
कथा के अंत में कहा जाता है — "हे करवा माता, जैसे वीरावती का सुहाग लौटाया, वैसे ही सबका सुहाग अमर रखना।"
कथा का संदेश
- •व्रत में सच्ची श्रद्धा और धैर्य सबसे महत्वपूर्ण है।
- •व्रत असली चंद्रमा को देखकर ही खोलना चाहिए — इसीलिए आज भी महिलाएं छलनी से चांद देखती हैं, यह याद दिलाने के लिए कि छलनी के पीछे का दीपक नहीं, असली चांद ही देखना है।
- •भाई-बहन का प्रेम भी इस कथा का भावुक पक्ष है — प्रेम में भी सत्य नहीं छोड़ना चाहिए।
करवा और मगरमच्छ की कथा
एक नदी के किनारे करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। एक दिन नदी में स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने उसके पति का पैर पकड़ लिया। पति ने करवा को पुकारा। करवा ने दौड़कर कच्चे सूत के धागे से मगरमच्छ को बांध दिया और यमराज के पास पहुंची। उसने यमराज से कहा कि मगरमच्छ को नरक भेजें और उसके पति को जीवनदान दें। यमराज ने पहले मना किया, पर करवा ने कहा कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह उन्हें श्राप दे देगी। पतिव्रता के श्राप के भय से यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेजा और करवा के पति को दीर्घायु का वरदान दिया। माना जाता है कि इसी करवा के नाम पर इस व्रत का नाम "करवा चौथ" पड़ा।
द्रौपदी का व्रत
महाभारत काल की कथा के अनुसार जब अर्जुन तपस्या के लिए नीलगिरि पर्वत पर गए और पांडवों पर संकट आए, तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से उपाय पूछा। श्रीकृष्ण ने उन्हें वह कथा सुनाई जो भगवान शिव ने माता पार्वती को इस व्रत के बारे में सुनाई थी, और करवा चौथ का व्रत करने की सलाह दी। द्रौपदी ने विधिपूर्वक व्रत किया और पांडवों के संकट दूर हुए।
कथा सुनने की विधि
- 1करवा फेरने के बाद अन्य महिलाओं के साथ पूजा के घेरे में बैठें।
- 2दाहिने हाथ में गेहूं के सात या तेरह दाने या अक्षत लें।
- 3पूरे ध्यान से कथा सुनें या पढ़ें; बीच में उठें नहीं।
- 4कथा के बाद दाने पूजा स्थान पर अर्पित करें या अर्घ्य के जल में डालने के लिए रख लें।
- 5सास या किसी बड़ी सुहागिन के चरण स्पर्श करके बायना दें।
पूजा की पूरी विधि पढ़ें — करवा चौथ पूजा विधि 2026।
कथा से जुड़े प्रतीक
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| सात भाई | परिवार का प्रेम और सुरक्षा |
| छलनी के पीछे दीपक | भ्रम और असत्य |
| असली चांद | सत्य, धैर्य और ईश्वर की कृपा |
| कौर में बाल, छींक | अपशकुन — गलत मार्ग का संकेत |
| एक वर्ष का व्रत | प्रायश्चित, धैर्य और अटूट श्रद्धा |
| पति का पुनर्जीवन | सच्ची भक्ति की विजय |
करवा चौथ की आरती
कथा के बाद कई परिवारों में करवा माता या गौरी माता की आरती की जाती है। इस आरती में सौभाग्य और परिवार के कल्याण की प्रार्थना होती है। आरती के बाद बायना सास को देकर आशीर्वाद लिया जाता है।
कथा का आज के समय में संदेश
वीरावती की कथा केवल एक धार्मिक कहानी नहीं, बल्कि जीवन के कई सबक देती है — कठिन समय में धैर्य न खोना, प्रेम में भी सत्य से समझौता न करना, और अपनी भूल स्वीकार करके उसे सुधारने का साहस रखना। करवा की कथा साहस और आत्मविश्वास का संदेश देती है, जबकि द्रौपदी की कथा संकट में ईश्वर पर विश्वास रखने की प्रेरणा देती है। आज के समय में करवा चौथ पति-पत्नी के बीच प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का उत्सव बन गया है।
सारांश
वीरावती की कथा भक्ति और धैर्य सिखाती है और बताती है कि व्रत केवल असली चांद को छलनी से देखकर ही क्यों खोला जाता है। 29 अक्टूबर 2026 को पूजा के समय हाथ में अनाज के दाने लेकर यह कथा सुनें और चंद्रोदय के बाद अर्घ्य दें। चंद्रोदय का समय — करवा चौथ 2026 चंद्रोदय समय।
अखंड सौभाग्यवती भव!



