कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान क्यों? संक्षिप्त उत्तर
कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर पर विजय के उपलक्ष्य में किया जाता है, जब देवताओं ने काशी में दीप जलाए थे — यही देव दीपावली की उत्पत्ति है। शास्त्र कार्तिक को दीपों का मास कहते हैं: पूरे कार्तिक में, और विशेषकर इसकी पूर्णिमा पर, दीपदान करने से अंधकार और पापों का नाश होता है, पितरों का सम्मान होता है और चातुर्मास के बाद जागे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। 2026 में कार्तिक पूर्णिमा मंगलवार, 24 नवंबर को है; शाम को प्रदोष काल में, पूर्णिमा तिथि रहते (रात 8:23 तक) दीपक जलाएं।
| विवरण | समय |
|---|---|
| कार्तिक पूर्णिमा | मंगलवार, 24 नवंबर 2026 |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | रात 8:23 |
| चंद्रोदय (दिल्ली) | शाम 5:01 |
| देव दीपावली (वाराणसी प्रदोष) | शाम 5:08 – 7:47 |
पूरी जानकारी — कार्तिक पूर्णिमा 2026 कब है?
दीपदान के कारण
1. त्रिपुरारी विजय और देव दीपावली
पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर के तीन पुत्रों — तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली — ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से तीन अद्भुत नगर (त्रिपुर) प्राप्त किए थे — सोने, चांदी और लोहे के, जो आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर घूमते थे। वरदान था कि इन्हें केवल तभी नष्ट किया जा सकेगा, जब तीनों नगर एक सीध में आएं और उन्हें एक ही बाण से भेदा जाए। इन असुरों के अत्याचार से त्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने पृथ्वी को रथ, सूर्य-चंद्र को पहिये, मेरु पर्वत को धनुष और भगवान विष्णु को बाण बनाकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन तीनों नगरों को एक ही बाण से भस्म कर दिया। इसी विजय की खुशी में देवताओं ने स्वर्ग से उतरकर काशी में गंगा तट पर दीप जलाए — यही देव दीपावली, यानी "देवताओं की दिवाली" है। 2026 में वाराणसी में देव दीपावली का प्रदोष मुहूर्त शाम 5:08 से 7:47 बजे तक है।
2. कार्तिक — दीपों का मास
पद्म पुराण और स्कंद पुराण में कार्तिक मास में दीपदान की बहुत महिमा बताई गई है। कहा गया है कि कार्तिक में भगवान विष्णु और तुलसी के सामने जलाया गया एक दीपक भी अनंत पुण्य देता है, और जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास दीपदान करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा इस मास का अंतिम और सबसे पवित्र दिन है, इसलिए इस दिन का दीपदान पूरे महीने के दीपदान का फल देने वाला माना गया है।
3. भगवान विष्णु का जागरण
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। कार्तिक पूर्णिमा तक के दिनों में दीपदान जागृत भगवान के स्वागत और उनकी आराधना का प्रतीक है। देवउठनी की जानकारी — देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
4. पितरों का मार्गदर्शन
मान्यता है कि नदी तट, चौराहे और पीपल के नीचे जलाए गए दीपक पितरों को मार्ग दिखाते हैं और उन्हें शांति देते हैं। कार्तिक मास में आकाशदीप (ऊंचे बांस पर टांगा गया दीपक) जलाने की परंपरा भी पितरों से जुड़ी है।
5. भीतर का प्रकाश
दीपक ज्ञान का प्रतीक है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है। मिट्टी का दीया शरीर, तेल कर्म, बाती मन और ज्योति आत्मा का प्रतीक मानी जाती है। दीपदान का अर्थ है — अपने भीतर के प्रकाश को जगाना और उसे दूसरों तक पहुंचाना।
दीपदान कहां करें?
| स्थान | महत्व |
|---|---|
| घर का मुख्य द्वार | मां लक्ष्मी का स्वागत, नकारात्मकता का निवारण |
| पूजा स्थान | इष्ट देव की आराधना |
| तुलसी | कार्तिक में तुलसी दीपदान का विशेष पुण्य |
| रसोई और जल स्थान | अन्नपूर्णा और वरुण देव का सम्मान |
| विष्णु और शिव मंदिर | त्रिपुरारी पूर्णिमा पर शिव, और कार्तिक में विष्णु |
| नदी और सरोवर तट | गंगा घाट, पुष्कर, स्थानीय तालाब — पितरों के लिए |
| पीपल का पेड़ | देवताओं और पितरों का वास |
| दीप प्रवाह | पत्तों की नाव पर तैरते दीपक (जहां अनुमति हो) |
दीपदान की विधि
- 1सूर्यास्त के बाद घी या तिल के तेल वाले मिट्टी के दीपक लें।
- 2दीपकों को थाली में रखकर रोली, अक्षत और फूल से उनकी पूजा करें।
- 3दीप मंत्र बोलते हुए उन्हें प्रज्वलित करें:
- 4दीपकों को चुने हुए स्थानों पर रखें और परिवार, पितरों और सभी प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
- 5नदी में दीप प्रवाह करें तो पत्तों (पत्तल) की नाव पर दीपक रखें और "ॐ नमः शिवाय" या "ॐ नमो नारायणाय" बोलते हुए प्रवाहित करें।
कितने दीपक जलाएं?
सामान्यतः 5, 11, 21, 51 या 108 दीपक जलाए जाते हैं। एक लोकप्रिय परंपरा 365 बत्तियों वाला दीपक जलाने की है — मान्यता है कि इससे वर्ष के हर दिन के दीपदान का फल मिलता है। कई मंदिरों में इस दिन 365 बत्तियों के दीपक जलाए जाते हैं। फिर भी संख्या से अधिक श्रद्धा का महत्व है — एक दीपक भी सच्चे मन से जलाया जाए, तो पूर्ण फल देता है। दीपकों की संख्या की परंपरा पर और पढ़ें — दिवाली पर कितने दीपक जलाने चाहिए?
देश भर में कार्तिक पूर्णिमा के दीपोत्सव
- •वाराणसी: देव दीपावली — गंगा के 80 से अधिक घाटों पर लाखों दीपक।
- •पुष्कर (राजस्थान): पुष्कर सरोवर के घाटों पर दीपदान और महाआरती। पढ़ें — पुष्कर मेला और कार्तिक पंचांग।
- •ओडिशा: "बोइता बंदाण" — पत्तों और कागज़ की नावों पर दीपक प्रवाहित करके प्राचीन समुद्री व्यापार की स्मृति।
- •दक्षिण भारत: कार्तिगई दीपम की परंपरा में घरों और मंदिरों में दीयों की पंक्तियां।
- •हरिद्वार और प्रयागराज: गंगा स्नान और दीप प्रवाह।
पर्यावरण का ध्यान
- •मिट्टी के दीपक और पत्तों की नाव का उपयोग करें; प्लास्टिक और थर्मोकोल से बचें।
- •नदियों में पूजा सामग्री, फूल-माला और कचरा न डालें; फूलों को खाद बनाएं।
- •घाटों पर भीड़ में सुरक्षा का ध्यान रखें; बच्चों को पानी से दूर रखें।
- •जहां स्थानीय प्रशासन ने दीप प्रवाह पर रोक लगाई हो, वहां तट पर ही दीपक जलाएं।
दीपदान के लिए सही तेल और बाती
| दीपक | ईंधन | बाती |
|---|---|---|
| भगवान विष्णु के लिए | गाय का घी | रुई की लंबी बाती |
| भगवान शिव के लिए | घी या तिल का तेल | रुई की बाती |
| तुलसी के लिए | घी | गोल बाती |
| पितरों के लिए (नदी तट) | तिल का तेल | रुई की बाती |
| मुख्य द्वार | सरसों या तिल का तेल | रुई की बाती |
कार्तिक में घी के दीपक को सर्वश्रेष्ठ माना गया है; घी उपलब्ध न हो तो तिल का तेल उपयोग करें।
आकाशदीप की परंपरा
कार्तिक मास में घर की छत पर एक ऊंचे बांस के सिरे पर दीपक या कंदील टांगने की परंपरा को आकाशदीप कहते हैं। मान्यता है कि यह दीपक पितरों को मार्ग दिखाता है और भगवान विष्णु की कृपा दिलाता है। आकाशदीप पूरे कार्तिक मास जलाया जाता है और कार्तिक पूर्णिमा पर इसका समापन होता है। आजकल कई परिवार सुरक्षा के लिए LED कंदील का उपयोग करते हैं, पर पूजा के लिए मिट्टी का दीपक ही श्रेष्ठ है।
सारांश
कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर 2026) पर दीपदान भगवान शिव की त्रिपुरारी विजय और देव दीपावली का उत्सव है, कार्तिक के दीप मास की पूर्णता है, और भगवान विष्णु व पितरों का सम्मान है। शाम को घर, तुलसी, मंदिर और जलाशयों पर पूर्णिमा समाप्ति (रात 8:23) से पहले दीपक जलाएं।
हर हर महादेव!



