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गोवर्धन पूजा पर गोवर्धन महाराज की परिक्रमा क्यों की जाती है?

गोवर्धन परिक्रमा क्यों — श्रीकृष्ण कथा, राधा कुंड और पूंछरी सहित 21 किमी मार्ग, नियम, परिक्रमा के प्रकार और 10 नवंबर 2026 की घरेलू परिक्रमा।

ज्योतिष अनुसंधान केंद्र·7 मिनट पठन·अंतिम अपडेट: 9 अक्टू॰ 2026
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गोवर्धन पूजा पर गोवर्धन महाराज की परिक्रमा क्यों की जाती है?
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मुख्य वैदिक बिंदु (Key Highlights)

गोवर्धन परिक्रमा क्यों — श्रीकृष्ण कथा, राधा कुंड और पूंछरी सहित 21 किमी मार्ग, नियम, परिक्रमा के प्रकार और 10 नवंबर 2026 की घरेलू परिक्रमा।

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गोवर्धन परिक्रमा क्यों? संक्षिप्त उत्तर

भक्त गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) की परिक्रमा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप माना जाता है। श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से इंद्र के बजाय गोवर्धन की पूजा करवाई, अपनी उंगली पर पर्वत उठाकर उनकी रक्षा की और फिर बताया कि वे और गोवर्धन एक ही हैं। इसलिए गोवर्धन की परिक्रमा करना श्रीकृष्ण की परिक्रमा करने के समान है — समर्पण, कृतज्ञता और भक्ति का प्रतीक। मथुरा के पास पूरी परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (7 कोस) की है, जो नंगे पैर, घड़ी की दिशा में, पर्वत को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए की जाती है। गोवर्धन पूजा, मंगलवार 10 नवंबर 2026 को लाखों श्रद्धालु यह परिक्रमा करेंगे, और घरों में गोबर से बने गोवर्धन की सात परिक्रमा की जाएगी।

गोवर्धन पूजा 2026: एक नज़र में

विवरणसमय (नई दिल्ली)
गोवर्धन पूजा / अन्नकूटमंगलवार, 10 नवंबर 2026
प्रतिपदा तिथि9 नवंबर दोपहर 12:31 – 10 नवंबर दोपहर 2:00
प्रातःकाल मुहूर्तसुबह 6:40 – 8:50

तारीख और पूजा विधि — गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

परिक्रमा का धार्मिक महत्व

1. गिरिराज स्वयं श्रीकृष्ण हैं

भागवत परंपरा के अनुसार जब ब्रजवासियों ने पहली बार गोवर्धन को अन्नकूट अर्पित किया, तो श्रीकृष्ण स्वयं एक विशाल रूप में पर्वत पर प्रकट हुए और भोग ग्रहण किया। उन्होंने कहा — "मैं ही गोवर्धन हूं।" ब्रजवासियों ने उसी विराट स्वरूप की परिक्रमा की। तभी से गिरिराज जी को श्रीकृष्ण का स्वरूप मानकर पूजा जाता है, और उनकी शिलाएं घरों में ठाकुर जी के रूप में पूजी जाती हैं।

2. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

गोवर्धन पर्वत ने ब्रज की गायों को चारा, लोगों को जल, लकड़ी, फल और वर्षा से आश्रय दिया। उसकी परिक्रमा प्रकृति के प्रति धन्यवाद का भाव है — पहाड़, वन, जलाशय और पशुधन ही हमारे जीवन का आधार हैं।

3. अहंकार का त्याग

यहीं देवराज इंद्र का अहंकार टूटा था। परिक्रमा हमें याद दिलाती है कि हम भी अपने अहंकार को छोड़कर विनम्रता से ईश्वर की शरण में जाएं। नंगे पैर, धूल में चलना स्वयं विनम्रता का अभ्यास है।

4. पुण्य और मनोकामना

परंपरा में माना जाता है कि श्रद्धा से की गई गोवर्धन परिक्रमा से पाप नष्ट होते हैं, मन की कामनाएं पूर्ण होती हैं और भगवान की भक्ति दृढ़ होती है। कहा जाता है कि परिक्रमा का हर कदम एक यज्ञ के समान फल देता है।

5. परिक्रमा का आध्यात्मिक अर्थ

परिक्रमा का अर्थ है — ईश्वर को अपने जीवन का केंद्र बनाना। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, वैसे ही भक्त अपने इष्ट के चारों ओर घूमकर यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन की हर गतिविधि उसी केंद्र के इर्द-गिर्द है।

घटते पर्वत की कथा

एक लोकप्रिय कथा के अनुसार गोवर्धन, द्रोणाचल पर्वत के पुत्र थे। पुलस्त्य ऋषि उन्हें काशी ले जा रहे थे, इस शर्त पर कि रास्ते में उन्हें कहीं नीचे नहीं रखेंगे। ब्रज भूमि पहुंचने पर ऋषि ने किसी कारणवश उन्हें नीचे रख दिया, और ब्रज की सुंदरता पर मुग्ध गोवर्धन ने आगे जाने से मना कर दिया। क्रोधित ऋषि ने श्राप दिया कि वे प्रतिदिन तिल भर घटते जाएंगे। यही कारण बताया जाता है कि आज गोवर्धन पर्वत बहुत ऊंचा नहीं है।

परिक्रमा मार्ग (लगभग 21 किलोमीटर)

परिक्रमा प्रायः दो भागों में की जाती है:

भागदूरीप्रमुख स्थान
बड़ी परिक्रमालगभग 12 किमीदानघाटी → जतीपुरा (मुखारविंद) → पूंछरी का लौठा → आन्यौर → गोवर्धन
छोटी परिक्रमालगभग 9 किमीमानसी गंगा → राधा कुंड और श्याम कुंड → कुसुम सरोवर → उद्धव कुंड → गोवर्धन

प्रमुख स्थल

  • •दानघाटी: परिक्रमा का प्रारंभ स्थल, जहां श्रीकृष्ण गोपियों से "दान" (कर) लेते थे।
  • •मानसी गंगा: मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने इसे अपने मन से प्रकट किया।
  • •जतीपुरा (मुखारविंद): गिरिराज जी के मुख का स्थान, जहां दुग्धाभिषेक होता है।
  • •पूंछरी का लौठा: गिरिराज जी की "पूंछ" का स्थान — यह राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित है, इसलिए राजस्थान के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।
  • •राधा कुंड और श्याम कुंड: ब्रज के सबसे पवित्र सरोवर; कार्तिक मास में यहां स्नान का विशेष महत्व है।
  • •कुसुम सरोवर: सुंदर स्थापत्य वाला ऐतिहासिक सरोवर।

परिक्रमा के प्रकार

  • •सामान्य परिक्रमा: नंगे पैर पैदल।
  • •दंडवत परिक्रमा: पूरे मार्ग पर दंडवत प्रणाम करते हुए — इसमें कई दिन या सप्ताह लगते हैं।
  • •दूध-धारा परिक्रमा: पूरे मार्ग पर लोटे से दूध की धार गिराते हुए।
  • •वार्षिक प्रमुख दिन: गोवर्धन पूजा और मुड़िया पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) पर विशाल भीड़ होती है।

परिक्रमा के नियम

  • •घड़ी की दिशा में चलें, पर्वत को अपनी दाहिनी ओर रखें।
  • •संभव हो तो नंगे पैर चलें; "गिरिराज महाराज की जय" या श्रीकृष्ण के नाम का जाप करते रहें।
  • •पर्वत से पत्थर (शिला) न उठाएं — इसे वर्जित माना जाता है।
  • •परिक्रमा शुरू करने के बाद उसे पूरा करें (बीच में विश्राम कर सकते हैं)।
  • •सात्विक आचरण रखें; झगड़ा और कटु वचन से बचें।
  • •मार्ग में कूड़ा न फैलाएं; ब्रज की पवित्रता बनाए रखें।

घर पर परिक्रमा (10 नवंबर 2026)

जो लोग मथुरा नहीं जा सकते, वे घर पर ही गोवर्धन परिक्रमा कर सकते हैं:

  1. 1आंगन में गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाएं।
  2. 2सुबह प्रातःकाल मुहूर्त (दिल्ली में 6:40 से 8:50) में उसकी पूजा करें।
  3. 3अन्नकूट का भोग लगाएं।
  4. 4आकृति की सात परिक्रमा करें — एक व्यक्ति लोटे से दूध या जल की धार गिराए और दूसरा जौ या अनाज बिखेरे।
  5. 5परिक्रमा करते हुए 'गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक' मंत्र या "गिरिराज धरण की जय" बोलें।

परिक्रमा पर जाने वालों के लिए सुझाव

  • •10 नवंबर को भारी भीड़ रहेगी; सुबह बहुत जल्दी या रात में परिक्रमा शुरू करें।
  • •पानी, हल्का भोजन और आवश्यक दवाइयां साथ रखें।
  • •नंगे पैर चलने का अभ्यास न हो, तो मोज़े पहन सकते हैं।
  • •बच्चों और बुजुर्गों के साथ रिक्शा या ई-रिक्शा की सुविधा का उपयोग कर सकते हैं — भाव मुख्य है।
  • •मौसम के अनुसार नवंबर में सुबह-शाम हल्की ठंड रहती है; हल्का गर्म कपड़ा रखें।

परिक्रमा का अनुभव: क्या उम्मीद करें?

21 किलोमीटर की परिक्रमा सामान्य गति से चलने पर लगभग 5 से 7 घंटे में पूरी होती है। मार्ग पक्का है और जगह-जगह मंदिर, कुंड, विश्राम स्थल, पानी और भोजन की व्यवस्था मिलती है। रात में भी अनेक भक्त परिक्रमा करते हैं, विशेषकर पूर्णिमा पर। गोवर्धन पूजा के दिन मार्ग पर भजन-मंडलियां, भंडारे और भक्तों का अपार उत्साह देखने को मिलता है। परिक्रमा के अंत में मानसी गंगा या दानघाटी मंदिर में गिरिराज जी को दूध और भोग अर्पित करके यात्रा पूर्ण की जाती है।

गिरिराज शिला की पूजा

अनेक वैष्णव परिवार घर में गिरिराज जी की छोटी शिला को ठाकुर जी के रूप में पूजते हैं। परंपरा के अनुसार यह शिला किसी संत या मंदिर से विधिवत प्राप्त की जाती है; पर्वत से स्वयं पत्थर तोड़कर लाना वर्जित माना गया है। गोवर्धन पूजा पर इस शिला का दूध, दही और पंचामृत से अभिषेक करके अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

मुड़िया पूर्णिमा और गोवर्धन

गोवर्धन पूजा के अलावा आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) पर लगने वाला मुड़िया पूर्णिमा मेला गोवर्धन परिक्रमा का सबसे बड़ा आयोजन है, जिसमें देश भर से लाखों भक्त आते हैं। यह परंपरा सनातन गोस्वामी की स्मृति से जुड़ी है, जिनके शिष्यों ने उनके निधन पर सिर मुंडवाकर परिक्रमा की थी — इसीलिए इसे "मुड़िया" पूर्णिमा कहते हैं।

परिक्रमा के दौरान जाप के मंत्र

  • •'गिरिराज धरण की जय' या 'गिरिराज महाराज की जय'
  • •'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे'
  • •'गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक। विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥'

परिक्रमा के दौरान मन में भगवान का नाम चलता रहे, तो थकान कम लगती है और यात्रा साधना बन जाती है।

सारांश

गोवर्धन परिक्रमा इसलिए की जाती है क्योंकि गिरिराज जी को स्वयं श्रीकृष्ण माना जाता है, और उनकी परिक्रमा समर्पण व कृतज्ञता का प्रतीक है। 10 नवंबर 2026 को संभव हो तो मथुरा के पास 21 किमी की परिक्रमा करें, या घर पर गोबर के गोवर्धन की सात परिक्रमा करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

गोवर्धन परिक्रमा क्यों की जाती है?

गिरिराज जी को स्वयं श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है; उनकी परिक्रमा श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और अहंकार त्याग का प्रतीक है।

गोवर्धन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

पूरी परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (7 कोस) की है — बड़ी परिक्रमा लगभग 12 किमी और छोटी परिक्रमा लगभग 9 किमी।

गोवर्धन परिक्रमा किस दिशा में करते हैं?

घड़ी की दिशा में, पर्वत को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए परिक्रमा की जाती है।

पूंछरी का लौठा कहां है?

पूंछरी का लौठा गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित है और इसे गिरिराज जी की पूंछ का स्थान माना जाता है।

घर पर गोवर्धन की परिक्रमा कैसे करें?

गोबर से बने गोवर्धन की पूजा करके सात परिक्रमा करें — एक व्यक्ति दूध या जल की धार गिराए और दूसरा अनाज बिखेरे।

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

गोवर्धन पूजा मंगलवार, 10 नवंबर 2026 को है; दिल्ली में प्रातःकाल मुहूर्त सुबह 6:40 से 8:50 बजे तक है।

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