हिन्दू चंद्र कैलेंडर में अमावस्या (Amavasya) और पूर्णिमा (Purnima) मास के दो सबसे महत्वपूर्ण खगोलीय एवं आध्यात्मिक पड़ाव हैं। ये दोनों तिथियाँ चंद्र मास के दो पक्षों — शुक्ल पक्ष (उजाला पखवाड़ा) और कृष्ण पक्ष (अंधेरा पखवाड़ा) — के चरमोत्कर्ष को दर्शाती हैं।
खगोलीय स्थिति का वैज्ञानिक आधार
- 1अमावस्या: जब सूर्य और चंद्रमा एक ही देशांतर (0 अंश के अंतर) पर होते हैं, तो इसे खगोलीय युति (Conjunction) कहते हैं। इस स्थिति में चंद्रमा का प्रकाशित भाग पृथ्वी से पूरी तरह ओझल रहता है और आकाश में चंद्र दर्शन नहीं होते। यह कृष्ण पक्ष की 15वीं व अंतिम तिथि होती है।
- 2पूर्णिमा: जब सूर्य और चंद्रमा एक-दूसरे से ठीक 180 अंश के विपरीत कोण पर होते हैं, तो इसे खगोलीय प्रतियुति (Opposition) कहते हैं। इस समय चंद्रमा पर सूर्य का प्रकाश पूर्ण रूप से पड़ता है और वह गोल रजत थाली की भांति चमकता है। यह शुक्ल पक्ष की 15वीं व अंतिम तिथि होती है।
आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
• अमावस्या: पितृ तर्पण एवं आत्म-संयम का पर्व:
अमावस्या का दिन पूर्वजों (पितरों) के प्रति श्रद्धा और तर्पण के लिए समर्पित होता है। भौतिक कार्यों के बजाय इस दिन दान, ध्यान और श्राद्ध कर्म को प्रशस्त माना गया है:
• पूर्णिमा: सत्यनारायण व्रत एवं मांगलिक उल्लास:
पूर्णिमा को पूर्णता, सकारात्मक ऊर्जा और श्रीहरि विष्णु की कृपा का दिन माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा, उपवास एवं पवित्र नदियों में स्नान करते हैं:
व्रत और पूजा का समय निर्धारण कैसे करें?
तिथि का मान सूर्योदय या सूर्यास्त के समय के अनुसार देखा जाता है:
अपना पंचांग पर अपने शहर का सूर्योदय, सूर्यास्त और तिथि की सटीक समाप्ति घड़ी देखकर सही दिन का चयन करें।



