पारंपरिक हिन्दू कैलेंडर (हिन्दू पंचांग) एक अत्यंत वैज्ञानिक एवं सुव्यवस्थित चंद्र-सौर (Luni-Solar) काल-गणना प्रणाली है। जहाँ पाश्चात्य ग्रेगोरियन कैलेंडर पूर्णतः सौर गति (365.25 दिन) पर आधारित है और इस्लामी हिजरी कैलेंडर पूर्णतः चंद्र गति (354 दिन) पर, वहीं भारतीय ऋषियों ने सूर्य और चंद्रमा दोनों की गतियों का समन्वय करके एक अद्वितीय कैलेंडर की रचना की।
हिन्दू मास एवं पक्षों की संरचना
1. चंद्र मास (Lunar Months):
चंद्रमा के आधार पर वर्ष में 12 मास होते हैं:
• चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन (क्वार), कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ एवं फाल्गुन।
प्रत्येक मास को दो पक्षों में विभाजित किया गया है — शुक्ल पक्ष (चांदनी रातें, प्रतिपदा से पूर्णिमा) और कृष्ण पक्ष (अंधेरी रातें, प्रतिपदा से अमावस्या)। राजस्थान एवं उत्तर भारत में 'पूर्णिमांत' पद्धति (पूर्णिमा के अगले दिन से नया महीना) का प्रचलन है, जबकि गुजरात और दक्षिण भारत में 'अमांत' पद्धति मानी जाती है।
2. सौर मास एवं संक्रांति:
सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उसे 'संक्रांति' कहते हैं। वर्ष में 12 संक्रांतियाँ होती हैं, जिनमें मकर संक्रांति (सूर्य का उत्तरायण) और मेष संक्रांति अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) का खगोलीय रहस्य
एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष 365.25 दिनों का। इस प्रकार हर वर्ष 11 दिनों का अंतर आ जाता है। यदि इस अंतर को न सुधारा जाए, तो होली और दीवाली जैसे ऋतु-आधारित त्योहार 10-12 वर्षों में सर्दियों से गर्मियों में खिसक जाएंगे।
इस अंतर को समाप्त करने के लिए वैदिक खगोलविदों ने अधिक मास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) का अद्भुत नियम बनाया। लगभग प्रत्येक 32.5 महीने (लगभग 3 वर्ष) के बाद एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है — ऐसा मास जिसमें सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती। इस मास को भगवान विष्णु का पवित्र 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाता है जिसमें जप, तप और दान का अनंत फल मिलता है।
विक्रम संवत् और नव वर्ष
उत्तर भारत और राजस्थान में सर्वाधिक प्रामाणिक कैलेंडर विक्रम संवत् है, जिसकी शुरुआत ईसा पूर्व 57 (57 BCE) में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा की गई थी। ग्रेगोरियन वर्ष में 57 जोड़ने पर विक्रम संवत् प्राप्त होता है (जैसे वर्ष 2026 + 57 = विक्रम संवत् 2083)। सनातन नववर्ष 1 जनवरी से नहीं, बल्कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (चैत्र नवरात्रि का पहला दिन) से प्रारंभ होता है।
अपना पंचांग शुद्ध दृक सिद्धान्त के आधार पर आज की तिथि, पक्ष, संवत्सर और आगामी वर्षों के संपूर्ण पंचांग की गणना प्रस्तुत करता है।



