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गणगौर पूजा 2027: राजस्थान में ईसर-गौर की पूजा विधि

गणगौर पूजा 2027 की पूरी विधि: ईसर-गौर की स्थापना, सामग्री सूची, 22 मार्च से रोज़ का पूजन, सिंजारा, 9 अप्रैल की पूजा, कथा, भोग और विसर्जन।

ज्योतिष अनुसंधान केंद्र·6 मिनट पठन·अंतिम अपडेट: 9 अक्टू॰ 2026
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गणगौर पूजा 2027: राजस्थान में ईसर-गौर की पूजा विधि
✨प्रामाणिक वैदिक संदर्भ सचित्र

मुख्य वैदिक बिंदु (Key Highlights)

गणगौर पूजा 2027 की पूरी विधि: ईसर-गौर की स्थापना, सामग्री सूची, 22 मार्च से रोज़ का पूजन, सिंजारा, 9 अप्रैल की पूजा, कथा, भोग और विसर्जन।

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गणगौर पूजा विधि: संक्षिप्त उत्तर

गणगौर पूजा ईसर (भगवान शिव) और गौर (माता पार्वती) की आराधना है, जो धुलंडी — सोमवार 22 मार्च 2027 — से रोज़ की जाती है और गणगौर, शुक्रवार 9 अप्रैल 2027 को पूर्ण होती है। हर सुबह महिलाएं और कन्याएं दूब और फूल लाकर, कलश में जल भरकर, गणगौर के गीत गाते हुए ईसर-गौर की पूजा करती हैं। गणगौर के दिन व्रत रखकर दीवार पर कुमकुम, मेहंदी और काजल की 16-16 बिंदियां लगाई जाती हैं, गुने और सुहाग का सामान अर्पित किया जाता है, कथा सुनी जाती है, और शाम को गौर को जलाशय पर पानी पिलाकर विदा किया जाता है।

चरणतारीख (2027)
ईसर-गौर स्थापना, पूजन आरंभसोमवार, 22 मार्च (धुलंडी)
रोज़ सुबह का पूजन22 मार्च – 8 अप्रैल
सिंजारागुरुवार, 8 अप्रैल
गणगौर व्रत, कथा, विसर्जनशुक्रवार, 9 अप्रैल

तारीख और तिथि की पूरी जानकारी — गणगौर 2027 कब है?

गणगौर पूजा की सामग्री

  • •ईसर-गौर की प्रतिमा — होली की राख/मिट्टी से बनी, या लकड़ी की रंगी हुई पारंपरिक प्रतिमाएं (कई घरों में पीढ़ियों पुरानी लकड़ी की गणगौर होती है)
  • •चौकी और लाल या पीला कपड़ा
  • •तांबे या मिट्टी का कलश, जल
  • •दूब (दूर्वा) और ताज़े फूल
  • •रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत
  • •मेहंदी और काजल (16 बिंदियों के लिए)
  • •गौर के लिए चुनरी, लहंगा-ओढ़नी, छोटे गहने
  • •सुहाग का सामान — चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, कंघी, शीशा
  • •गुने (आटे और गुड़/चीनी से बने तले हुए मीठे पकवान), फल, मिठाई
  • •घी का दीपक, धूप, कपूर

ईसर-गौर की स्थापना (22 मार्च)

  1. 1धुलंडी की सुबह स्नान करके पूजा स्थान साफ करें।
  2. 2होलिका दहन की राख या साफ मिट्टी से ईसर और गौर की छोटी प्रतिमाएं बनाएं — गौर को स्त्री रूप में और ईसर को पगड़ी वाले पुरुष रूप में। लकड़ी की प्रतिमा हो तो उसे साफ करके नए वस्त्र पहनाएं।
  3. 3चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर प्रतिमाएं स्थापित करें; गौर को ईसर के बाईं ओर रखें।
  4. 4कलश में जल भरकर पास रखें और दीपक जलाएं।
  5. 5पूजा का संकल्प लें — कुंवारी कन्याएं अच्छे वर के लिए, विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए।

रोज़ सुबह की पूजा (22 मार्च से 8 अप्रैल)

  1. 1सुबह स्नान करके बगीचे या खेत से दूब और फूल लाएं — कई जगह कन्याएं समूह में गीत गाते हुए दूब लेने जाती हैं।
  2. 2कलश में ताज़ा जल भरें।
  3. 3हाथ में दूब लेकर जल में डुबोएं और ईसर-गौर पर जल के छींटे देते हुए पूजा करें।
  4. 4रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें; दीपक जलाएं।
  5. 5गणगौर के पारंपरिक गीत गाएं — इन गीतों में गौरी के मायके आने, ईसर के उन्हें लेने आने और सुहाग की मंगल कामना का भाव होता है।
  6. 6कई परिवारों में रोज़ दीवार पर एक बिंदी लगाकर दिन गिने जाते हैं।

पानी पिलाने की रस्म: पूजन के दिनों में दोपहर को कन्याएं सिर पर कलश या लोटा रखकर जल लाती हैं और गौर को "पानी पिलाती" हैं — यह गौरी के प्रति स्नेह और सेवा का प्रतीक है।

सिंजारा (8 अप्रैल 2027)

गणगौर से एक दिन पहले सिंजारा मनाया जाता है:

  • विवाहित बेटियों और बहुओं के लिए मायके से घेवर, मेहंदी, वस्त्र, चूड़ियां और श्रृंगार का सामान आता है।
  • महिलाएं हाथों-पैरों में मेहंदी लगाती हैं और गौर को भी मेहंदी लगाई जाती है।
  • शाम को गौर का विशेष श्रृंगार होता है और गीत-नृत्य होते हैं।
  • गणगौर के दिन की पूजा (9 अप्रैल 2027)

    1. 1सुबह: स्नान करके सोलह श्रृंगार करें; व्रत का संकल्प लें।
    2. 2श्रृंगार: गौर को नई चुनरी, गहने और सुहाग का सामान अर्पित करें; ईसर को पगड़ी और वस्त्र।
    3. 316 बिंदियां: दीवार पर कुमकुम, मेहंदी और काजल से 16-16 बिंदियां लगाएं — ये सोलह श्रृंगार का प्रतीक हैं।
    4. 4पूजन: दूब से जल के छींटे, रोली-अक्षत, फूल, फल और गुने का भोग।
    5. 5सुहाग अर्पण: गौर को चढ़ाया गया सिंदूर और सुहाग का सामान बाद में सुहागिनें स्वयं धारण करती हैं।
    6. 6कथा: गणगौर की कथा सुनें (नीचे देखें)।
    7. 7भोजन: दिन में एक समय भोजन; परंपरा के अनुसार गणगौर का प्रसाद पुरुषों को नहीं दिया जाता।
    8. 8विसर्जन: दोपहर बाद या शाम को गौर को सिर पर रखकर गीत गाते हुए कुएं, बावड़ी, तालाब या झील पर ले जाएं, पानी पिलाएं और मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन करें। लकड़ी की प्रतिमा अगले वर्ष के लिए सुरक्षित रख ली जाती है।

    गणगौर की कथा (संक्षेप में)

    एक बार भगवान शिव, माता पार्वती और नारद जी भ्रमण पर निकले और एक गांव पहुंचे। गांव की गरीब महिलाएं प्रेम से थालियों में हल्दी-अक्षत लेकर सबसे पहले पूजा करने आईं। पार्वती जी ने प्रसन्न होकर उन पर सुहाग रस छिड़क दिया, और वे अखंड सौभाग्यवती हुईं। बाद में संपन्न घरों की महिलाएं सोने-चांदी के थालों में पकवान लेकर आईं, तब तक सुहाग रस समाप्त हो चुका था। शिव जी के पूछने पर पार्वती जी ने अपनी उंगली से रक्त की बूंदें छिड़ककर उन्हें भी सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। इसके बाद पार्वती जी ने नदी किनारे बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा की, और शिव जी ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो स्त्री इस दिन श्रद्धा से पूजा करेगी, उसका सुहाग अखंड रहेगा। यह कथा बताती है कि सच्ची श्रद्धा, धन-वैभव से अधिक मूल्यवान है।

    पर्यावरण का ध्यान

    मिट्टी की प्रतिमाएं विसर्जन के लिए अच्छी हैं, लेकिन झीलों और बावड़ियों में फूल-मालाएं, प्लास्टिक और चुनरी न डालें। उदयपुर, जयपुर जैसे शहरों में जल स्रोत पीने के पानी से जुड़े हैं — घर पर बाल्टी में विसर्जन करके मिट्टी को गमले में डालना भी अच्छा विकल्प है।

    गणगौर के गीतों का भाव

    गणगौर पूजन गीतों के बिना अधूरा है। ये लोकगीत पीढ़ियों से मौखिक रूप में चले आ रहे हैं, और इनमें कुछ प्रमुख भाव मिलते हैं:

  • दूब लाने के गीत: सुबह कन्याएं बाग-बगीचों से दूब और फूल लाते हुए गौरी को पूजने का निमंत्रण देती हैं।
  • पूजन के गीत: गौरी से अखंड सौभाग्य, अच्छे वर और भाई-परिवार की कुशलता की कामना।
  • पानी पिलाने के गीत: गौरी को प्यासी मानकर उन्हें स्नेह से जल पिलाने का भाव।
  • विदाई के गीत: ईसर जी गौरी को लेने आते हैं, और मायके से विदाई का भावुक क्षण।
  • अपने परिवार या मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाओं से ये गीत सीखना इस परंपरा को जीवित रखने का सबसे सुंदर तरीका है।

    लकड़ी की गणगौर

    राजस्थान के कई परिवारों में लकड़ी की रंगी हुई ईसर-गौर प्रतिमाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। इन्हें हर वर्ष नए वस्त्र और गहने पहनाए जाते हैं, और विसर्जन के बजाय केवल प्रतीकात्मक रूप से जल पिलाकर अगले वर्ष के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है। जयपुर, उदयपुर और बीकानेर के बाज़ारों में गणगौर से पहले ऐसी पारंपरिक प्रतिमाएं और उनके वस्त्र-आभूषण बिकते हैं।

    सारांश

    गणगौर पूजा 22 मार्च 2027 (धुलंडी) से शुरू करके रोज़ सुबह दूब-जल से ईसर-गौर का पूजन करें, 8 अप्रैल को सिंजारा मनाएं, और 9 अप्रैल को व्रत, 16 बिंदियां, गुने का भोग, कथा और जलाशय पर विसर्जन के साथ पूजा पूर्ण करें। राजस्थान के अन्य त्योहार — राजस्थान के प्रमुख धार्मिक त्योहार।

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    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

    गणगौर पूजा कब से कब तक होती है?

    2027 में धुलंडी, 22 मार्च से गणगौर, 9 अप्रैल तक रोज़ पूजा होती है।

    गणगौर पूजा में क्या-क्या सामग्री लगती है?

    ईसर-गौर की प्रतिमा, कलश, दूब, फूल, रोली, कुमकुम, मेहंदी, काजल, चुनरी, सुहाग का सामान, गुने और दीपक।

    गणगौर पर 16 बिंदियां क्यों लगाते हैं?

    कुमकुम, मेहंदी और काजल की 16-16 बिंदियां सोलह श्रृंगार और अखंड सौभाग्य का प्रतीक हैं।

    गणगौर का भोग क्या है?

    आटे और गुड़ या चीनी से बने तले हुए मीठे गुने, फल और मिठाई।

    गणगौर को पानी पिलाने की रस्म क्या है?

    पूजन के दिनों में और गणगौर के दिन गौर को कलश के जल या जलाशय पर ले जाकर जल अर्पित किया जाता है, फिर विसर्जन होता है।

    क्या कुंवारी लड़कियां गणगौर पूज सकती हैं?

    हां, कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना से गणगौर पूजती हैं।

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