दशहरा क्यों मनाया जाता है? संक्षिप्त उत्तर
दशहरा अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है — मुख्य रूप से भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण के वध और मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के संहार की स्मृति में। यह पर्व आश्विन शुक्ल दशमी को, नवरात्रि की नौ रातों के ठीक बाद आता है। परंपरा में इस दिन को पांडवों द्वारा शमी वृक्ष से अपने शस्त्र वापस लेने और राजा रघु की स्वर्ण वर्षा की कथा से भी जोड़ा जाता है। 2026 में दशहरा मंगलवार, 20 अक्टूबर को है।
भगवान राम और रावण की पूरी कहानी
श्रीराम का वनवास
अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्र थे — राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। सबसे बड़े पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला था। किंतु दासी मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो पुराने वरदान मांगे — पहला, उनके पुत्र भरत का राज्याभिषेक हो, और दूसरा, राम को चौदह वर्ष का वनवास मिले। वचन से बंधे दशरथ को यह स्वीकार करना पड़ा। श्रीराम ने मुस्कुराते हुए पिता की आज्ञा मानी, और उनकी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन चले गए। पुत्र-वियोग में राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए, और भरत ने राम की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य चलाया।
सीता हरण
वनवास के दौरान पंचवटी में रावण की बहन शूर्पणखा ने राम से विवाह का प्रस्ताव रखा और ठुकराए जाने पर सीता पर आक्रमण किया। तब लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी। बदला लेने के लिए रावण ने मारीच नामक राक्षस को सोने का हिरण बनाकर भेजा। सीता के आग्रह पर राम हिरण के पीछे गए, और छल से राम की आवाज़ सुनकर लक्ष्मण भी उनकी सहायता को निकल पड़े — जाते-जाते उन्होंने कुटिया के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींच दी। तभी रावण साधु के वेश में आया, भिक्षा के बहाने सीता को रेखा से बाहर बुलाया और पुष्पक विमान में बैठाकर लंका ले गया। गिद्धराज जटायु ने रावण से युद्ध किया, पर घायल होकर गिर पड़े और राम को सीता हरण की सूचना देकर प्राण त्याग दिए।
हनुमान जी और सीता की खोज
सीता की खोज करते हुए राम और लक्ष्मण की भेंट वानरराज सुग्रीव और उनके मंत्री हनुमान से हुई। राम ने बालि का वध करके सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य दिलाया, और सुग्रीव ने वानर सेना को चारों दिशाओं में सीता की खोज के लिए भेजा। हनुमान जी ने विशाल समुद्र लांघकर लंका में प्रवेश किया, अशोक वाटिका में सीता माता को खोजा और उन्हें राम की अंगूठी दी। उन्होंने रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध किया, और जब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवाई, तो उसी आग से उन्होंने पूरी लंका जला दी और राम को सीता का समाचार दिया।
रामसेतु और युद्ध
वानर सेना ने नल और नील के नेतृत्व में समुद्र पर रामसेतु का निर्माण किया। मान्यता है कि सेतु बनाने से पहले श्रीराम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की पूजा की थी। रावण के छोटे भाई विभीषण ने उसे सीता लौटाने की सलाह दी, तो रावण ने उनका अपमान करके निकाल दिया, और विभीषण राम की शरण में आ गए। इसके बाद भीषण युद्ध हुआ। अंगद को शांति दूत बनाकर भेजा गया, पर रावण नहीं माना। युद्ध में मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए, तब हनुमान जी संजीवनी बूटी के लिए पूरा द्रोणागिरि पर्वत उठा लाए। आगे कुंभकर्ण और मेघनाद (इंद्रजीत) का वध हुआ और अंत में श्रीराम का सामना स्वयं रावण से हुआ।
रावण का अंत
राम जितनी बार रावण के सिर काटते, वे फिर से उग आते। तब विभीषण ने रहस्य बताया कि रावण की नाभि में अमृत है, जो उसके प्राणों की रक्षा कर रहा है। श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र से रावण की नाभि पर प्रहार किया और रावण धराशायी हो गया। परंपरा के अनुसार यह विजय आश्विन शुक्ल दशमी को मिली — जिसे हम विजयादशमी के रूप में मनाते हैं। इसके बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया, सीता माता की अग्नि परीक्षा हुई और श्रीराम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे, जहां उनके स्वागत में दीपावली मनाई गई।
श्रीराम की शक्ति पूजा
एक लोकप्रिय परंपरा (विशेषकर बांग्ला कृत्तिवास रामायण) के अनुसार अंतिम युद्ध से पहले श्रीराम ने मां दुर्गा की आराधना की थी। शरद ऋतु में देवी का यह आवाहन "असमय" था, इसलिए इसे अकाल बोधन कहा जाता है। राम ने 108 नील कमल अर्पित करने का संकल्प लिया था। पूजा के समय एक कमल कम पाया गया, तो "कमलनयन" कहलाने वाले राम अपना एक नेत्र अर्पित करने को तैयार हो गए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां प्रकट हुईं और विजय का आशीर्वाद दिया। यही कारण है कि नवरात्रि के ठीक बाद दशहरा आता है, और बंगाल में शारदीय दुर्गा पूजा इसी अकाल बोधन की स्मृति में होती है। हिंदी में महाकवि निराला की प्रसिद्ध कविता "राम की शक्ति पूजा" भी इसी प्रसंग पर आधारित है।
मां दुर्गा द्वारा महिषासुर वध
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में वर्णन है कि महिषासुर नामक भैंसे के रूप वाले असुर को वरदान था कि कोई पुरुष या देवता उसका वध नहीं कर सकेगा। इस वरदान के बल पर उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को निकाल दिया। तब ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई — मां दुर्गा। सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र प्रदान किए — शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने वज्र, और हिमालय ने सवारी के लिए सिंह। मां ने नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन — विजयादशमी — उसका वध किया। इसी कारण मां को "महिषासुरमर्दिनी" कहा जाता है, और बंगाल में दुर्गा पूजा बिजोया दशमी के साथ समाप्त होती है।
दशहरे से जुड़ी अन्य कथाएं
पांडव और शमी वृक्ष
महाभारत के अनुसार बारह वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष के अज्ञातवास में पांडव राजा विराट के यहां वेश बदलकर रहे। उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र एक शमी वृक्ष पर छिपा दिए थे। अज्ञातवास समाप्त होने पर अर्जुन ने उसी वृक्ष से गांडीव धनुष निकालकर कौरव सेना को पराजित किया। परंपरा के अनुसार यह विजयादशमी का दिन था — इसीलिए दशहरे पर शमी पूजा और शस्त्र पूजा की जाती है। शमी पूजा का मंत्र भी इसी कथा की याद दिलाता है:
राजा रघु और कौत्स
एक कथा के अनुसार ऋषि वरतंतु के शिष्य कौत्स को गुरु-दक्षिणा के रूप में चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देनी थीं। वे अयोध्या के राजा रघु के पास गए। रघु ने कुबेर पर आक्रमण की तैयारी की, तो भयभीत कुबेर ने शमी और आपटा के वृक्षों पर स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी। कौत्स ने आवश्यक मुद्राएं लेकर बाकी लोगों में बांट दीं। इसी की याद में महाराष्ट्र में दशहरे पर आपटा के पत्ते "सोना" कहकर एक-दूसरे को भेंट किए जाते हैं।
क्या रावण केवल खलनायक था?
रावण एक महान विद्वान, वेदों का ज्ञाता, भगवान शिव का परम भक्त, कुशल राजनीतिज्ञ और शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता माना जाता है। फिर भी काम, क्रोध और अहंकार ने उसका सर्वनाश कर दिया। मान्यता है कि मृत्यु शय्या पर पड़े रावण से राम ने लक्ष्मण को राजनीति का ज्ञान लेने भेजा था। यह प्रसंग सिखाता है कि ज्ञान और शक्ति होते हुए भी यदि चरित्र और विनम्रता न हो, तो पतन निश्चित है। रावण दहन के महत्व पर विस्तार से पढ़ें — दशहरे पर रावण दहन क्यों किया जाता है?
रामलीला की परंपरा
उत्तर भारत में नवरात्रि के दिनों में होने वाली रामलीला दशहरे की आत्मा है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी के शिष्यों ने रामचरितमानस के आधार पर रामलीला मंचन की परंपरा को लोकप्रिय बनाया। वाराणसी के रामनगर की रामलीला लगभग एक महीने तक चलती है और यूनेस्को ने भारत की रामलीला परंपरा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया है। दिल्ली के लाल किला मैदान और रामलीला मैदान की रामलीलाएं भी देश भर में प्रसिद्ध हैं।
आज के जीवन में दशहरे का संदेश
रावण के दस सिरों को अक्सर दस दुर्गुणों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है — काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर (ईर्ष्या), स्वार्थ, अन्याय, क्रूरता और अहंकार। रावण का पुतला जलाना हमें अपने भीतर के इन दुर्गुणों को जलाने की प्रेरणा देता है। राम का जीवन सिखाता है कि मर्यादा, धैर्य, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलकर ही स्थायी विजय मिलती है। दशहरे पर बच्चों को रामकथा सुनाना उन्हें इन मूल्यों से जोड़ने का सबसे सुंदर तरीका है।
सारांश
दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर और मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के साथ-साथ पांडवों के शमी वृक्ष और राजा रघु की स्वर्ण वर्षा की स्मृति में मनाया जाता है। 2026 में इसे 20 अक्टूबर को मनाएं — और अपने भीतर के कम से कम एक "रावण" को त्यागने का संकल्प लें। तारीख और मुहूर्त के लिए पढ़ें — दशहरा 2026 कब है?
जय श्री राम!



